Friday, July 16, 2010

एक आसरो वादळी

एक आसरो वादळी


आठूं पोर अडीकतां
वीतै दिन ज्यूं मास।
दरसण दे अब वादळी
मत मुरधर नै तास॥

आस लगायां मुरधरा
देख रही दिन रात।
भागी आ तूं वादळी
यी रुत वरसात॥

कोरां-कोरां धोरियां
डूंगां डूंगां डैर।
आव रमां अे वादळी
ले-ले मुरधर ल्हैर॥

ग्रीखम रुत दाझी धरा
कळप रही दिन-रात।
मेह मिलावण वादळी
वरस वरस वरसात॥

नहीं नदी नाळा अठै
नहिं सरवर सरसाय।
एक आसरो वादळी
मरु सूकी मत जाय॥

कविवर चंद्रसिं बिरकाळी री 'वादळी' सूं.....

1 comment:

  1. चन्द्र सिह बिकराली री बादली सारु आभार सा

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