


म्हारा व्हाला मींत अर जगचावा राजस्थानी कवि भाई सम्पत सरल आज समूळै विश्व में आपरी निरवाळी छिब बणाई है । आप दुनियां भर रै कवि सम्मेलना में जावै अर राजस्थानी रो झंडो उंचावै! आप देश रा सगळा टीवी चैनलां माथै छाया रैवै ! आप मूळत: हास्य-व्यंग्य लिखै अर बोलै ! आपरा दोय राजस्थानी गीत म्हारै हाथ लाग्या है !आपरी निज़र है ऐ दोन्यूं गीत-
[१]
** कुण ईंको सपनो चोरयो है **
नील गगन की ओढ कामळी, श्रमजीवी धरत्यां सोरयो है ।
गडै कांकरा सूळ सरीखा, कुण ईंको सपनो चोरयो है ?
जो जग सींचै बहा पसीनो
जग को कवच जिका को सीनो ’
वो ही जग नै भार होयगो, जो जग को बोझो ढोरयो है
ठंडो चूल्हो ले’र फ़ूंकणी,
फ़ूंक मारतां चढै धूजणी,
हाड-मांस को एक पूतळो , छाणस की रोटी पोरयो है ।
दिन भर रोज मजूरी करणी,
जोड़्यां हाथ हजूरी करणी,
फ़ेर चांच नै चुग्गो कोनी, दास मलूका के होरयो है
लगा हाज़री बैठै छायां,
और करै बस आयां बायां,
पांचूं घी में अर अंटी में, रिपिया पर रिपिया गोरयो है ।
मैनत ईंकी फ़ळ ओरां नै
के चाबी सूंपी चोरां नै ?
अमरस पीवै और भायला, आम बिचारो ओ बोरयो है ।
[२]
** जळ म्हारो धरती ओरां की **
समदर पर बरसै है बादळ, ले म्हारा पोखर को पाणी
ठाडाई देखो जोरां की,
जळ म्हारो धरती ओरां की,
बूंद-बूंद सांचर कर राखी, म्हे काईं अब तक थां ताणी
नितकी मेघ मनावै करसो,
थोडा़ तो म्हारै भी बरसो,
इन्दर की अणदेखी कारण, दाता मुख भूल्या गाणी-माणी ।
अब कुण सूं अरदास करांजी,
अब कुण पर विश्वास करां जी,
सूरज खुद साज़िश में शामिल, मानो तेल गतक गी घाणी ।
सगळा रळ मिळ खम ठोकां तो
छळी पवन को मग रोकां तो,
जद ही हक मिलसी रै भाया, नीतर कोनी आणी-जाणी ।
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-ठावो ठिकाणो-व्हाइट हाउस, 85-मयूर विहार, नांगल जैसा बोहरा,झोटवाडा़,जयपुर-302012
-कानांबाती-9414044418
1. राजस्थानी हिन्दी से भी प्राचीन भाषा है । प्रख्यात आलोचक डा. नामवर जी के अनुसार राजस्थानी ने ही हिन्दी को जन्म दिया । हिन्दी मेँ भी 42 बोलियां है ।
2.हर भाषा के दो स्वरूप होते हैँ । एक अकादमिक और दूसरा लोकरंजक यानी बोलचाल वाला । हिन्दी का अकादमिक स्वरूप एक है परन्तु हिन्दी अनेक प्रकार से बोली जाती है ।
3. हर भाषा तब तक अलग अलग तरीके से अपनी समस्त बोलियोँ अपनाई जाती है परन्तु राजमान्यता के बाद सरकार के भाषा विभाग उनका मानक स्वरूप तय करता है और फिर उस मानक स्वरूप को सरकारी कामकाज, शिक्षा, न्यायालय व पत्र पत्रिकाएं काम मेँ लेते हैँ। पंजाबी,गुजराती,मराठी,सिन्धी,तमिल, तेलगु, मलयालम व हिन्दी आदि भाषाओँ मेँ भी ऐसा ही हुआ । हमारे पड़ोसी राज्य पंजाब की पंजाबी भाषा को ही लेँ । पंजाबी मेँ गुरमुखी, निहंगी, पटियालवी, दोआबी, मांझी, होश्यारपुरी, पवादी, भटियाणी,सरायकी आदि 27 बोलियां हैँ । सब बोलियां अलग अलग तरीके से बोली जाती हैँ परन्तु सब को मिला कर मानक स्वरूप तैयार किया गया है । वह है अकादमिक पंजाबी । इसी संदर्भ मेँ राजस्थानी भाषा, इसकी 73 बोलियां तथा भावी मानक स्वरूप को देखेँ ।
4. भाषा का मानक स्वरूप सरकार तय करती है क्यौँ कि उसे अपनी प्रजा के साथ संवाद स्थापित करना होता है व राजकाज को औसत जनभाषा मे करना होता है ।
5. राज्योँ का गठन भाषा के आधार पर हुआ था और राजस्थान का गठन इसकी राजस्थानी भाषा के आधार पर ही हुआ था । जब राजस्थानी भाषा ही नहीँ तो राजस्थान कैसे बन गया ?
6। राजस्थान के साथ भाषा के मामले मेँ आजादी के साथ ही शुरु हो गया था । हिन्दी को पनपाने की जिम्मेदारी डाली गई । मान्यता की मांग तभी से है ।