Saturday, December 25, 2010

सिमरथ रो सियाळो

गरीबियै री गरमी,

सिमरथ रो सियाळो

-रामस्वरूप किसान



धोरां री धरती पर पाळो उतरयो । गे़ड चढ्यो। बूढै-बडेरां रा हाड कांप्या। आठूं पौर एक ई रट। आज तो भोत रट्ठ पड़ै। कोझी रीळ चालै। उतरादी डांफर है। बंचगे रईयो टाबरो! पण टाबर तो कूदता फिरै। बां रो तो पाळो बकरिया चरै। माल्ला तो बूढियां रै मंडग्या। खड़्यै दिन रिजाई में बड़ै अर भातै जाय'र किरड़ै री भांत नाड़ बारै काढै। पाळै में किरड़ै अर बूढै री एक गत। चौमासै रो सतरंगो किरड़ो पाळै में इकरंगो बणै। काळो मूराड़। सत बायरो। लकड़ी में घाल किन्नै ई बगाद्यो भांवूं। हालै ई कोनी। फगत आंख काढ़बो करै हंगायै पाडै दांई। एन ओ ही हाल बोदियां रो। कैबा चालै- टाबर नै म्हैं पालूं कोनी, जुवान मेरो भाई, बूढियै नै छोडूं कोनी, भावूं ओढै सात रिजाई।
पण जुवानां रो हाल ई सूं उल्टो। बां नै ओ पाळो मीठो लागै। मिसरी रै उनमान। नूंवो खून। पाळै नै कांई दिवाळ। बै तो कोढियै रट्ठ सूं आणंद काढणो जाणै। सांप रै फण सूं मिण काढणी आवै बां नै। ई सारू बै इण पाळै रो मजो लेवै। सियाळै री लाम्बी रात रो सुख लूटै।
सियाळो जोरावर रो साथी पण निजोरै रो बैरी। कैबा है- गरीबियै री गरमी, सिमरथ रो सियाळो। पाळै में गरीब में फोड़ा ढंगसिर गाबो जुड़ै नीं। जूती जु़डै नीं। अर ना सोवण नै बिछावण। पाळै रो असली दु:ख तो पोह री रात में फुटपाथ पर सूत्या जाणै बापड़ा। पण इण में पाळै रो कांई दोस! ओ दोस तो है जिकां रो ई है। पाळो तो पाळो ई है बापड़ो। परकरती रो लाडलो। जकै रो एक न्यारो ई फुटरापो हुवै। ओ रुत रो पातस्या नीं तो बजीर जरूर है। ई रुत में खाणै-पीणै अर पै'रणै-औढणै रो न्यारो ई सुवाद। लोग जमावणो जमावै। पींडिया खावै। खोवो काढै। गाजर-पाक बणावै। घी-दूध खाणै रो ई ईं रुत में मजो है।
आ रुत मरु रै सांवळै गात नै गौरो कर नाखै। उन्याळै अर चौमासै में तलीज्योडो आदमी रुत ईं में टंवरा काढण लागै। उण रै हाडां चामड़ी आवै। क्यूँ के ना गरमी ना तावड़ो। ना ऊमस ना झळ। सो' कीं सीतळ ई सीतळ। जकै में ना माखी ना माछर। ईं वास्तै नां चिरमिराट ना झरळाट। ना खुजली ना खाज। अर ना ई आवै पसेव। डील पड़्यो रैवै पोथी जिसो। अर ओ पोथी जिसो डील पाळै री लुज्जत लूटै। गाबां में गुरक होय'र चूंतरियां पर हथाई करै। होका सुरड़ै। बातां रा बडका पाड़ै। मुंह री भाप बारै काढै। अर घणो पाळो हुवै तो धुंई बाळै। जकी रै च्यारूंमेर बैठ हथाई जोड़ै। क्यूं ? पाळै रा है नीं मजा। अर सोवण बगत सोड़ियै-रिजाई में बड़'र बां नै ताता करै। रिजाई नै च्यारूंमेर सूं दाब'र भीतर रो मौसम मन-माफक बणाल्यै। अर पछै लेवै मीठा-मीठा सुपना।
अर अबार बांचो पोह-माह म्हींनै सारू लोक चलत रा ऐ दोय दूहा-

उगमियो उतराध रो, नवजोबन संजोग।
पोस महीनै गोरड़ी, कदै न छंडै लोग।।

माघ महीनै सी पड़ै, तिण रुत चलै बलाय।
ऊंडै पड़वै पोढबो, कामण कंठ लगाय।।

Friday, August 27, 2010

समै गी बात

समै गी बात तो बटोड़ा ई बताद्यै



अच्छी
बरसात ने बदली इलाके की रंगत


परलीका. इलाके में अच्छी बरसात होने से एक ओर जहां किसानों के चेहरों पर रौनक देखी जा सकती है, वहीं हर कहीं पसरी हरियाली अच्छे जमाने का हाल बयान कर रही है। बाड़े-बटोड़ों में भी हरियाली देखते ही बनती है। बड़े-बुजुर्गों से अक्सर सुनी जाने वाली राजस्थानी कहावत 'समै गी बात तो बटोड़ा ई बताद्यै' को अब प्रत्यक्ष में देखा जा सकता है।
अच्छी बरसात ने इलाके की रंगत ही बदल दी है। खेतों में फसलें लहलहा रही हैं। काकडिय़ा, काचर, लोइया, टींडसी, तोरूं आदि की बेलें पसरी हैं और घर के खेत की देशी सब्जी के ठाठ हो गए हैं। पशुओं के लिए हरी घास का अभाव नहीं रहा। सड़क किनारे, गलियों और यहां तक कि छत और मुंडेर पर भी घास लहलहाता दिख रहा है। हाड़ी के लिए रखे गए खेतों में पसरा घास पशुओं को बरबस ही आकर्षित करता है। ग्रामीणों के अनुसार इन दिनों दूध की आमद बढ़ गई है और उन्हें पशुपालन एक लाभदायक पेशे के रूप में नजर आने लगा है।

बेलड़ल्यां लड़लूम
खेतों में पसरी बेलों पर बेशुमार फल आने से कातीसरे का असली रूप इस बार नजर आने लगा है और ऐसे में राजस्थानी के सुप्रसिद्ध कवि रामस्वरूप किसान के दूहे बरबस ही जुबान पर आने लगे हैं।
काचर लाग्या गोटिया, बेलड़ल्या लड़लूम।
तोरूं चढरी जांटियां, टींडसियां री धूम॥

सुरंगी रुत आई म्हारै देस
खेतों में पसरी हरियाली, अठखेलियां करते जिनावर, लबालब भरे तालाब-कुंड और डिग्गियां, गूंजते लोकगीत, हरे-भरे पेड़ों पर पंछियों का कलरव और मंद-मंद बहता शीतल समीर आदि मिलकर पूरे वातावरण को सुरमयी बना रहे हैं। ऐसे में खेतों में काम करते किरसाण-किरसानणी के कंठों से सुरमयी लोकगीत बरबस ही फूट पड़ते हैं- सुरंगी रुत आई म्हारै देस, भलेरी रुत आई म्हारै देस।

मूंग-मोठ की फसलें जबरी
किसानों के अनुसार इस बार मूंग, मोठ, बाजरा, ग्वार और अरंड पर फाल बहुत अच्छा है और इनकी रिकार्ड तोड़ फसलें होने के आसार हैं। मूंग-मोठ व अरंड का बाजार-भाव अच्छा होने से किसानों की आमद में अच्छी-खासी बढ़ोतरी होने के आसार दिखने लगे हैं। बरसों बाद सुरंगी फसलें देखने को मिली हैं। फलस्वरूप रोही के जिनावर हरिण, रोझ आदि की रूआंळी न्यारी दिखने लगी है। भैंसों की पीठें भी इतनी चिकनी हो गई हैं कि मक्खी फिसल जाए।
फोटो - परलीका के एक बाड़े में बटोड़े पर पसरी बेलें।
माफ़ करज्यो सा आ रपट दैनिक भास्कर अख़बार सारू हिंदी में ही लिखी ही अर 27 अगस्त 2010 नै छपी भी। सो अठै मूल रूप में ही लगा रैयो हूँ सा.
-डॉ. सत्यनारायण सोनी

Wednesday, August 4, 2010

वादळियां भागी फिरै

वादळियां भागी फिरै


सोनै सूरज ऊगियो
दीठी वादळियां।
मुरधर लेवै वारणा
भर-भर आंखडिय़ां॥

सूरज किरण उंतावळी
मिलण धरा सूं आज।
वादळियां रोक्यां खड़ी
कुण जाणै किण काज॥

सूरजमुखी सै सूकिया
कंवळ रह्या कमळाय।
राख्यो सुगणै सुरज नै
वादळियां विलमाय॥

छिनेक सूरज निखरियो
विखरी वादळियां।
चिलकण मुंह अब लागियो
धरा किरण मिळियां॥

छिन में तावड़ तड़तड़ै
छिन में ठंडी छांह।
वादळियां भागी फिरै
घात पवन गळबांह॥
-चंद्रसिंह

Thursday, July 22, 2010

मिलण पुकारै मुरधरा

मिलण पुकारै मुरधरा



खो मत जीवण, वावळी
डूंगर-खोहां जाय।
मिलण पुकारै मुरधरा
रम-रम धोरां आय॥

नांव सुण्यां सुख ऊपजै
हिवड़ै हुळस अपार।
रग-रग नाचै कोड में
दे दरसण जिण वार॥

आयी घणी अडीकतां
मुरधर कोड करै।
पान-फूल सै सूकिया
कांई भेंट धरै॥

आयी आज अडीकतां
झडिय़ा पान'र फूल।
सूकी डाळ्यां तिणकला
मुरधर वार समूल॥

आतां देख उंतावळी
हिवड़ै हुयो हुळास।
सिर पर सूकी जावतां
छूटी जीवण आस॥
-चंद्रसिंघ

आप लोगां नै दैनिक भास्कर रो कॉलम आपणी भासा आपणी बात किण भांत लाग्यो?